वैशाली जिले में ग्राम कचहरियों का बकाया भुगतान अटका: पैसे पर ‘कुंडी मार कर बैठे है अधिकारी-अमोद निराला,आंदोलन की चेतावनी

हाजीपुर: बिहार के वैशाली जिले में ग्राम कचहरियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और कर्मचारियों की जेबें खाली हैं, जबकि जिला प्रशासन की तिजोरी में लाखों रुपये का बकाया धूल फांक रहा है। पंचायती राज विभाग की ओर से समय-समय पर भेजी जाने वाली राशि जिला प्रशासन के पास पहुंच तो जाती है, लेकिन वहां से आगे नहीं बढ़ती। नतीजा? ग्राम कचहरियां कागज-कलम के अभाव में ठप पड़ी हैं, आम जनता का न्याय प्रभावित हो रहा है, और पंच-सरपंच डीएम कार्यालय के चक्कर काटते-काटते थक चुके हैं। यह आरोप कोई और नहीं, बल्कि बिहार प्रदेश पंच सरपंच संघ के अध्यक्ष अमोद कुमार निराला लगा रहे हैं, जिन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अधिकारियों पर ‘पैसे पर कुंडी मारकर बैठने’ का सीधा इल्जाम लगाया हैअमोद निराला ने बताया कि वैशाली जिले के सभी 16 प्रखंडों में ग्राम कचहरियों के पंच, सरपंच, उपसरपंच, सचिव और न्यायमित्रों का वर्तमान और पूर्व कार्यकाल का लाखों रुपये का बकाया लंबित है। “2011 से लेकर अब तक, हम पंच परमेश्वर लगातार मांग करते आ रहे हैं। कभी किसी मद में थोड़ा-बहुत पैसा दे दिया जाता है, लेकिन बाकी राशि लटकी रहती है। यह पूर्वाग्रह से ग्रसित लगता है,” उन्होंने कहा कि उनके मुताबिक, जिला प्रशासन बैंक से सूद कमाने के चक्कर में यह पैसा रोक रखा है, जिससे न सिर्फ ग्राम कचहरियों में बुनियादी सामग्री का अभाव है, बल्कि न्याय व्यवस्था भी चरमराई हुई है। आम आदमी का छोटा-मोटा विवाद सुलझाने वाली ये कचहरियां अब खुद न्याय की भिखारी बन गई हैं।निराला ने आगे चेतावनी देते हुए कहा कि वैशाली प्रशासन माननीय न्यायालयों का बोझ कम करने के बजाय बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। “बकाया राशि में विशेष भत्ता, कांटेजेंसी, भवन किराया, पंचम राज्य वित्त आयोग की अनुशंसित फर्नीचर मद आदि शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अगर एक सप्ताह के अंदर शत-प्रतिशत भुगतान नहीं किया गया, तो संघ आंदोलन चलाने को बाध्य होगा। इसकी सारी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर अफसरशाही की दीवारें इसे रोक रही हैं।यह मुद्दा सिर्फ वैशाली तक सीमित नहीं लगता; पूरे बिहार में ग्राम कचहरियों की ऐसी स्थिति सुनी जाती है, जहां निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी जेब से खर्च करके व्यवस्था चला रहे हैं। अमोद निराला का यह आक्रोश क्या जिला प्रशासन को जगाएगा, या फिर आंदोलन की राह पर ले जाएगा? आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा। ग्रामीण न्याय की इस लड़ाई में आम जनता की आवाज को कितना महत्व मिलता है, यह समय बताएगा।

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