
सोनपुर– विश्वविख्यात हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेले का इस बार अधूरी तैयारियों के साथ रविवार को उद्घाटन हो गया। इस मौके पर मेले ने अपनी ही पुरानी परंपरा को तोड़ दिया, गौरतलब है कि सदियों से सोनपुर मेले कि शुरुआत कार्तिक माह में होती थी जिसे इस बार सरकारी फैसले ने बदल दिया।परंपरागत रूप से यह मेला कार्तिक पूर्णिमा पर आरंभ होता है, लेकिन इस साल इसका मार्गशीर्ष (अगहन) महीने में उद्घाटन किया गया। उद्घाटन की यह तिथि धार्मिक रूप से कोई खास महत्व नहीं रखती। पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन ने इस बदलाव से पहले हरिहर क्षेत्र के मठाधीशों, संतों, पुजारियों या ब्राह्मणों से कोई राय नहीं ली। नतीजतन, धार्मिक रीति-रिवाजों पर इसका असर पड़ा। संतों ने पानी, बिजली व सफाई की कमी पर गुस्सा जताया। गंडक नदी तट पर संतों के कैंप और पंडालों में भी समुचित व्यवस्था नजर नहीं आई।

पूर्णिमा स्नान के बाद मेला सूना रहा
कार्तिक पूर्णिमा पर जब लाखों भक्त गंगा-गंडक संगम पर स्नान करने पहुंचे, तब तक मेले का आधिकारिक उद्घाटन नहीं हुआ था। इससे श्रद्धालु मेला घूमने से वंचित रह गए,और दुकानदारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
बिहार चुनाव ने डाली परंपरा पर आंच
इस साल बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों ने सोनपुर मेले की सदियों पुरानी परंपरा को प्रभावित किया। चुनाव को ध्यान में रखते हुए सारण जिलाधिकारी अमन समीर की अध्यक्षता में 7 अक्टूबर को सोनपुर अनुमंडल सभागार में बैठक हुई। यहां सर्वसम्मति से फैसला लिया गया कि मेला 9 नवंबर से शुरू होगा और 10 दिसंबर को समाप्त होगा। इतिहास में पहली बार तयशुदा तिथि 3 नवंबर की बजाय 9 नवंबर को उद्घाटन हुआ।उद्घाटन कमिश्नर स्तर के अधिकारी ने किया, इसलिए सामान्य राजनीतिक नेताओं वाले समारोहों जैसी भीड़ नहीं जुटी। हालांकि,डीएम अमन समीर के प्रयासों से मेला को आकर्षक और व्यवस्थित बनाने की कोशिश की गई। उनकी खास उपलब्धि यह रही कि मेले की अवधि (32 दिन) में कोई कटौती नहीं हुई। फिर भी, धार्मिक महत्व को दरकिनार करने से संतों और श्रद्धालुओं में नाराजगी बनी हुई है।

गज-ग्राह चौक पर पसरा सन्नाटा
उद्घाटन वाले दिन 9 नवंबर को, कार्तिक पूर्णिमा स्नान के बाद जब भक्त मेला क्षेत्र पहुंचे,तो गज-ग्राह चौक से संत रामलखन दास मार्ग तक उदासी छाई रही। गज-ग्राह चौक और हरिहरनाथ थाना मार्ग पर न तो कोई हलचल थी,न संतों के प्रवचन। पूरे साधु गाछी इलाके में स्थायी मठ-मंदिरों को छोड़कर कहीं भी पूर्व कि तरह मेले कि रौनक नहीं दिखी।संतों का मानना है कि यह सब धार्मिक तिथि की अनदेखी का नतीजा है। ज्ञात हो कि पहले ही श्री गजेंद्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने तिथि बदलाव पर अपना विरोध जता दिया था।

