राजनीतिक दलों का टूटता तिलिस्म: कार्यकर्ताओं का बढ़ता मोहभंग और लोकतंत्र की चुनौतियां

ऑफिस डेस्क — भारतीय राजनीति में एक गंभीर संकट उभर रहा है, जहां राजनीतिक दलों से कार्यकर्ताओं का मोहभंग तेजी से हो रहा है। यह न केवल दलों की आंतरिक मजबूती को कमजोर कर रहा है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को भी हिला रहा है। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता, जो पार्टी को आधार प्रदान करते हैं, चुनावी रणनीतियों में अक्सर उपेक्षित हो जाते हैं। ये कार्यकर्ता वर्षों तक पार्टी के लिए समर्पित रहते हैं—घर-घर जाकर प्रचार करते हैं, मतदाताओं से जुड़ते हैं, और सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब टिकट वितरण का समय आता है, तो दल परिवारवाद, धनबल, या सेलिब्रिटी की चमक पर दांव लगाते हैं, जिससे कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षाएं कुचल जाती हैं।यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह और तेज हुई है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सेलिब्रिटी उम्मीदवारों को उतारना एक आम रणनीति बन गई है। इतिहास में कई उदाहरण हैं जहां सेलिब्रिटी ने अपनी लोकप्रियता से बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों को हराया है। अमिताभ बच्चन ने 1984 में इलाहाबाद से चुनाव जीता, राजेश खन्ना ने 1991 में नई दिल्ली से जीत हासिल की, हेमा मालिनी और धर्मेंद्र जैसे सितारे लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं। हाल के वर्षों में भी स्मृति ईरानी, कंगना रनौत, और अन्य सेलिब्रिटी ने राजनीतिक सफलता पाई है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा है—ये सेलिब्रिटी अक्सर राजनीतिक दबावों, जमीनी मुद्दों, और निरंतर संघर्ष को सहन नहीं कर पाते। कई मामलों में, वे राजनीति छोड़ देते हैं या निष्क्रिय हो जाते हैं, और इसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतते हैं वे जमीनी कार्यकर्ता जो पार्टी की नींव मजबूत करते हैं।फिलहाल, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में यह समस्या स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। राज्य में कई सीटों पर राजनीतिक दलों के फैसलों ने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को स्तब्ध कर दिया है। उदाहरण के लिए, एक प्रमुख राजनीतिक दल ने एक प्रसिद्ध भोजपुरी कलाकार को टिकट दिया है। इस कलाकार की लोकप्रियता के कारण कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि वे चुनाव जीत सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि पिछले 5-10-15 वर्षों से पार्टी के साथ खड़े स्थानीय नेता और युवा कार्यकर्ताओं की क्या स्थिति है? इन कार्यकर्ताओं ने पार्टी को गांव-गांव में मजबूत किया, मतदाताओं के साथ रिश्ते बनाए, लेकिन अब उनकी जगह एक ‘पैराशूट’ उम्मीदवार ने ले ली है। इसी तरह, एक अन्य राष्ट्रीय दल ने एक युवा भोजपुरी और मैथिली गायिका को टिकट दिया है। उनकी प्रसिद्धि से जीत की संभावना तो है, लेकिन क्षेत्र के स्थानीय नेताओं और युवाओं पर क्या असर पड़ रहा है? वे वर्षों से पार्टी के लिए मेहनत कर रहे थे, लेकिन अब उनकी महत्वाकांक्षाएं दबा दी गई हैं।यह समस्या सभी दलों में व्याप्त है। पार्टी प्रमुख अक्सर पहले अपने परिवारजनों को टिकट देते हैं—चाहे वे राजनीतिक रूप से अनुभवहीन क्यों न हों। उसके बाद, धनबल और प्रभावशाली व्यक्तियों को प्राथमिकता मिलती है। ऐसे में, जमीनी कार्यकर्ता कहीं फिट नहीं बैठते। ‘हेलिकॉप्टर उम्मीदवार’ उतारने की यह प्रवृत्ति कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करती है। परिणामस्वरूप, समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी हो रही है। कई कार्यकर्ता टिकट न मिलने पर दूसरे दलों में चले जाते हैं, जिससे विचारधारा का लोप हो रहा है। आज की राजनीति में न दलों की कोई स्पष्ट विचारधारा बची है, न नेताओं की, और न ही कार्यकर्ताओं की। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है, क्योंकि विचारधारा-आधारित राजनीति ही सच्ची जनसेवा की गारंटी देती है।इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू मतदाताओं पर पड़ने वाला प्रभाव है। मतदाता अक्सर स्थानीय नेता या कार्यकर्ता से जुड़े होते हैं, जो उनके सुख-दुख में साथ देते हैं, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाते हैं, और क्षेत्रीय मुद्दों पर काम करते हैं। लेकिन जब पार्टी अचानक एक बाहरी उम्मीदवार को थोप देती है, तो मतदाता उलझन में पड़ जाते हैं। वे सोचते हैं—जिसने मेरा काम किया, उसे टिकट नहीं मिला; और जिसे मिला, वह कभी मेरे साथ नहीं रहा। इससे मतदाता या तो मतदान से विमुख हो जाते हैं, या भ्रमित होकर गलत निर्णय लेते हैं। मतदान प्रतिशत में गिरावट और अप्रत्याशित परिणाम इसी का नतीजा हैं।राजनीतिक दलों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बंद होनी चाहिए, और टिकट वितरण में जमीनी योगदान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इससे न केवल दल मजबूत होंगे, बल्कि मतदाताओं का विश्वास भी बढ़ेगा। स्थानीय नेता और कार्यकर्ताओं को मौका देकर ही सच्चे जनप्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया जा सकता है। यह मुद्दा न केवल दलों के लिए, बल्कि कार्यकर्ताओं, मतदाताओं, और समग्र लोकतंत्र के लिए चिंतन का विषय है। अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो राजनीतिक दलों का तिलिस्म पूरी तरह टूट सकता है, और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ सकती हैं।

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