
हाजीपुर — बिहार के वैशाली जिले में बसा हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र,जो लोकतंत्र की जननी वैशाली की धरती पर स्थित है, लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद्य किला माना जाता रहा है। गंगा नदी द्वारा पटना से अलग इस क्षेत्र को उत्तर बिहार का प्रवेश द्वार कहा जाता है, और यहां के मीठे केले की मिठास की तरह ही इसकी राजनीति भी रसीली रही है। लेकिन 2025 के विधानसभा चुनावों से पहले, घटते वोट मार्जिन और मजबूत विपक्षी हवा के बीच यह सीट भाजपा के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन रही है।हाजीपुर विधानसभा हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जो अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है,जबकि यह विधानसभा सीट सामान्य वर्ग के लिए खुली है। इसी भिन्नता के कारण राम विलास पासवान जैसे दिग्गजों का प्रभाव लोकसभा स्तर पर भले ही गहरा हो—जिन्होंने 1977 में विश्व रिकॉर्ड जीत का अंतर हासिल किया था—लेकिन विधानसभा में यह कम नजर आता है। फिर भी, पासवान परिवार के वर्तमान वारिस चिराग पासवान भाजपा की मदद में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
भाजपा का लंबा राज
पिछले दो दशकों से हाजीपुर भाजपा का गढ़ रहा है। 21वीं सदी की शुरुआत से पार्टी ने यहां लगातार सात बार जीत दर्ज की है। पूर्व विधायक और वर्तमान केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 2000 से चार बार यह सीट जीती। 2014 के उपचुनाव में राय के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उनके करीबी अवधेश सिंह ने कमान संभाली और 2015 व 2020 में भी सफल रहे। हालांकि, जीत के अंतर में लगातार कमी आ रही है। 2015 में 12,000 से अधिक वोटों से जीतने वाले सिंह को 2020 में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के देव कुमार चौरसिया ने मात्र 3,000 वोटों के फासले से चुनौती दी। उस चुनाव में सिंह को 85,552 (44.6%) वोट मिले, जबकि चौरसिया को 82,562 वोट। कुल 18 उम्मीदवारों के बीच यह मुकाबला बेहद रोमांचक रहा।हाजीपुर की राजनीति में यादव (लगभग 19%) और राजपूत (15%) वोटरों का दबदबा है, जबकि एससी मतदाता (21% से अधिक) और मुस्लिम समुदाय (8%) पर सभी पार्टियों की नजर टिकी रहती है। ग्रामीण बहुल (67% मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों से) इस क्षेत्र में वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर शहर भी शामिल है, जो इसे रणनीतिक महत्व देता है। समाजवादियों का पुराना गढ़ रहा यह इलाका अब भाजपा की सबसे मजबूत सीटों में शुमार है, लेकिन सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए एससी वोटों का ध्रुवीकरण चुनौतीपूर्ण होगा।
ऐतिहासिक झलक
1952 में कांग्रेस के सरयू प्रसाद पहले विधायक बने, उसके बाद 1957-62 में दीप नारायण सिंह ने जीत हासिल की। 1967 में सीपीआई के किशोरी प्रसन्न सिंह, 1969-72 में सोशलिस्ट पार्टी के मोती लाल कानन और 1977 में जनता पार्टी के जगन्नाथ प्रसाद यादव ने कमान संभाली। आपातकाल के बाद कांग्रेस और जनता दल जैसे दलों का दौर चला, लेकिन 2000 से भाजपा का प्रभुत्व कायम है।
2025 की तलवार
1 जनवरी 2024 तक यहां 3,52,082 पंजीकृत मतदाता थे। भाजपा के घटते मार्जिन को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 में भाजपा-राजद के बीच कड़ा मुकाबला होगा। चिराग पासवान का समर्थन भाजपा को मजबूती दे सकता है, लेकिन विपक्ष की रणनीति एससी-मुस्लिम वोट बैंक पर केंद्रित हो सकती है। हाजीपुर की यह सीट न केवल वैशाली, बल्कि पूरे बिहार की राजनीति की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है। देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में क्या भाजपा का कमल फिर खिलेगा, या राजद कि लहर लाएगी? आने वाले दिनों में इसका जवाब साफ होगा।

