“जय दादी की” की गूंज के साथ सम्पन्न हुई तीन दिवसीय जीवनी आधारित कथा! पटना सिटी के श्री रानी सती दादी मंदिर में भक्तों ने लिया दादी मां का आशीर्वाद

पटना सिटी में तीन दिवसीय जीवनी आधारित कथा का भव्य समापन हुआ, जिसने श्रद्धालुओं के मन में दादी मां की अमिट छाप छोड़ दी। मिरचाई गली स्थित श्री रानी सती दादी मंदिर में आयोजित इस कार्यक्रम ने अंत तक भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम दिखाया।समापन दिवस पर “जय दादी की” के उद्घोष से पूरा पटना सिटी गूंज उठा। देश-विदेश विख्यात कथा वाचक मुंबई के ऋषि कुमार शर्मा जी ने तीनों दिनों में दादी मां की जीवनी, उनके त्याग, भक्ति और शक्ति की गहन कथा सुनाई, जिससे हजारों भक्त भाव-विभोर हो गए। गायिका कोमल देवड़ा के मधुर भजनों ने वातावरण को और भी दिव्य बना दिया। अंतिम दिन विशेष आरती, हवन और सामूहिक भजन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।श्रद्धालुओं ने बताया कि इस कथा ने उनके जीवन में नई ऊर्जा और विश्वास का संचार किया। मारवाड़ी समाज सहित विभिन्न समुदायों के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। मंदिर समिति ने सभी भक्तों, कथावाचक और गायिका को धन्यवाद दिया तथा दादी मां से सबके कल्याण की प्रार्थना की।श्री रानी सती दादी जी का पूर्ण इतिहास और पौराणिक मान्यताश्री रानी सती दादी जी (नारायणी देवी) की कथा द्वापर युग से जुड़ी है और महाभारत काल की घटनाओं से प्रेरित है। पौराणिक कथानुसार, महाभारत युद्ध में अभिमन्यु की वीरगति के बाद उनकी पत्नी उत्तरा (राजा विराट की पुत्री) अपने सेवक राणा के साथ रणभूमि पहुंचीं। गर्भवती होने के कारण भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सती होने से रोका और वरदान दिया कि कलयुग में वे नारायणी देवी रूप में अवतरित होंगी तथा लोग उन्हें पूजेंगे।उत्तरा ने सेवक राणा को चिता की राख घोड़े पर लेकर यात्रा करने को कहा कि जहां घोड़ा रुके, वहां उनका मंदिर बने। इस वरदान से कलयुग में उत्तरा नारायणी देवी के रूप में राजस्थान के डोकवा गांव में गुरसमल बिरमेवाल की पुत्री के रूप में जन्मीं। उनका विवाह हिसार के तंधन दास से हुआ। पति की मृत्यु पर उन्होंने सती होकर पति-निष्ठा का प्रतीक स्थापित किया। सेवक राणा ने उनकी इच्छा पूरी की और घोड़ा झुंझुनू (राजस्थान) में रुका, जहां आज विश्व प्रसिद्ध रानी सती मंदिर है।वे नारी शक्ति, त्याग, सम्मान और भक्ति की प्रतीक हैं। पटना का यह मंदिर 1988 में स्थापित हुआ और मारवाड़ी समाज में विशेष स्थान रखता है। मुख्य मंदिर में त्रिशूल की पूजा होती है और प्रधान मंडप में उनका चित्र है।यह तीन दिवसीय कथा कार्यक्रम भक्तों के लिए आशीर्वाद स्वरूप रहा। दादी मां की कृपा से सभी के जीवन में सुख-शांति बनी रहे।जय दादी की! 🙏🔱(पूर्ण विवरण और अपडेट के लिए www.akhbarexpress.in विजिट करें।)

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